तानसेन समारोह-मधुभट्ट के ध्रुपद, यश देवले की गायकी, मैंडोलिन से मिले हिंदुस्तानी सुर
मधुभट्ट के ध्रुपद गायन से शीतल बयार में आई गरमाहट
जयपुर से आईं ध्रुपद गायिका डॉ. मधु भट्ट तैलंग की प्रस्तुति ने रसिकों पर गहरी छाप छोड़ी। तानसेन समारोह में मंगलवार को प्रातःकालीन सभा में चल रही शीतल बयार के बीच डॉ. मधु भट्ट का गायन हुआ तो वातावरण में गरमाहट दौड़ गई।
उन्होंने राग ” कोमल ऋषभ आशावरी” में आलापचारी करते हुए धमार ताल में बंदिश ” लाजन भीज गई” का खनकदार आवाज में गायन किया। इसके बाद शुद्ध धैवत के राग ” गुनकली” में तानसेन रचित बंदिश “जय शारदे भवानी” का गायन कर सुर सम्राट को स्वरांजलि अर्पित की। इसी के साथ उन्होंने अपने गायन को विराम दिया।उनके गायन में तिहाइयां एवं चक्करदार का उपयोग संगीतप्रेमियों के लिए सुनने योग्य था। उनके साथ पखावज पर अंकित पारिख और सारंगी पर आबिद हुसैन की संगत को भी रसिकों ने खूब सराहा।
यश देवले ने बिखेरे घरानेदार गायकी के सुर
दानेदार, बुलंद और सुरीली आवाज में जब युवा पीढ़ी के उदयीमान शास्त्रीय गायक यश देवले ने राग ” शुद्ध सारंग” और तीन ताल में निबद्ध छोटा ख्याल” अब मोरी बात मानी रे” का सुमधुर गायन किया तो प्रांगण घरानेदार गायकी से गुंजायमान हो उठा। ग्वालियर के सुविख्यात संगीत गुरू संजय देवले के सुपुत्र यश देवले ग्वालियर एवं आगरा घराने की गायकी में सिद्धहस्त हैं। उन्होंने अपने गायन की शुरुआत इसी राग और विलंबित एक ताल में बड़ा ख्याल ” ऐ बनाबन आयो री” के गायन से की। उनके गायन में सुंदर आलापचारी और बढ़त के साथ ठहराव ने रसिकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। यश देवले ने आगरा घराने के जितेन्द्र अभिषेकी द्वारा रचित मराठी रचना “घेई छंद मकरंद” को झपताल में पिरोकर पेश किया तो रसिक वाह वाह करने को मजबूर हो गए। इसी के साथ उन्होंने अपने गायन को विराम दिया।आपके साथ कुशल तबला संगत डॉ विनय विन्दे ने की। हारमोनियम पर पंडित महेश दत्त की संगत भी लाजवाब रही।
मैंडोलिन से मिले हिंदुस्तानी सुर तो धूप-छाँव का हुआ अहसास
पश्चिमी वाद्य यंत्र मैंडोलिन पर जब कोलकाता से आए अग्रणी पंक्ति के कलाकार सुगातो भादुड़ी की अंगुलियाँ थिरकीं तो रसिकों को कभी धुंध व कोहरा तो कभी तेज धूप का एहसास हुआ। उन्होंने राग ” अहीर विभास” में मनोहारी वादन किया।
इस राग का सृजन राग अहीर व विभास के मेल से हुआ है। राग “अहीर” जहाँ धुंध व कोहरे का आभास कराता है वहीं मारवा ठाठ का राग “विभास” धूप की अनुभूति देता है। जब इस राग का गायन सुबह व दोपहर के मिलन की बेला में होता है तो सुरों का अलग ही जादू पैदा होता है।
सुगातो भादुड़ी ने विधिवत आलापचारी के बाद मध्य लय तीन ताल में सितारखानी पेश की । उन्होंने तंत्रकारी के साथ गायकी अंग का भी बेहतरीन प्रदर्शन किया। बीन, रवाब, सरोद, सितार आदि वाद्य यंत्रों की रागदारी का समावेश उनके वादन में दिखाई दिया। मैंडोलिन वादन सुनकर गुणीय रसिक मंत्रमुग्ध हो गए। तबले पर उदयीमान तबला वादक की संगत शानदार रही।

