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DRDE में हुआ राष्ट्रीय सम्मेलन का शुभारंभ

ग्वालियर -रक्षा अनुसंधान एवं विकास स्थापना (DRDE) में ‘रसायन-जैव रक्षा क्षेत्र में प्रौद्योगिकी विकास की प्रगति में शैक्षणिक जगत और औद्योगिक क्षेत्र को सक्रिय और समन्वित करने हेतु राष्ट्रीय सम्मेलन 20 एवं 21 सितंबर का शुभारंभ हुआ। सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में पद्मभूषण डॉ. कृष्णा एल्ला, संस्थापक एवं कार्यकारी अध्यक्ष, भारत बायोटैक, डॉ. मनमोहन परीडा, निदेशक डी.आर.डी.ई. एवं सम्मेलन के आयोजन सचिव डॉ. अजय कुमार गोयल, वैज्ञानिक ‘जी’ मंच पर मौजूद थे।
आयोजन सचिव डॉ एके गोयल ने इस सम्मेलन के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज की दुनिया में जहाँ प्रत्येक 02 साल में प्रौद्योगिकी में आमूलचूल परिवर्तन हो रहे हों, वहाँ अनुसंधान एवं विकास में ‘एकला चलो रे’ की नीति कारगर नहीँ है।
ग्वालियर  DRDE  के निदेशक डॉ. मनमोहन परीडा ने उपस्थित प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान वैश्चिक स्थितियों को देखते हुए रसायन-जैव खतरे की संभावना को नकारा नहीँ जा सकता। एक ऐसे समय में जब भारत सरकार ने वर्ष 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य रखा है, हमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल करना होगा, तभी हम सही मायनों में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। डॉ परीडा ने भारत बायोटेक के अध्यक्ष पद्मभूषण डॉ कृष्णा एल्ला का स्वागत करते हुए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान का वर्णन किया एवं भारत की बायोटैक इंडस्ट्री के विकास में उनके अभूतपूर्व योगदान का भी जिक्र किया।
शोध पत्रों की स्मारिका एवं डी.आर.डी.ई. के उत्पादों की जानकारी देने वाली पुस्तक का भी विमोचन
मुख्य अतिथि पद्मभूषण डॉ. कृष्णा एल्ला ने अपने संबोधन में पिछले 20 वर्षो में एआई, रोबोटिक्स, जीनोम थेरेपी, मशीन लर्निंग, डीप माइंड, डिजिटल बायोलॉजी जैसी अद्यतन तकनीकों के कारण आये आमूलचूल परिवर्तनों की जानकारी पॉवर प्वाइंट प्रस्तुति के माध्यम से प्रतिभागियों को दी। उन्होंने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आर्थिक निवेश, जोखिम और लाभ-हानि का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि कोविड के दौरान अमेरिकी रक्षा संस्थानों ने mRNA तकनीक को बढ़ावा देने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। उन्होंने कहा कि जिस स्तर का आधारभूत ढ़ाचा एवं प्रशिक्षित वैज्ञानिक शक्ति डी.आर.डी.ई. में मौजूद है, उसे देखते हुए भारत में यही कार्य डी.आर.डी.ई. कर सकती है। अपने उद्बोधन में उन्होंने भारत बायोटेक एवं कोवैक्सीन सहित अनेक वैक्सीन की विकास यात्रा का भी ब्यौरा दिया। अपने संबोधन में उन्होंने वैश्विक अनुसंधान परिदृश्य का भी परिचय दिया।
उद्घाटन सत्र में मंच संचालन डॉ. एस. आई. आलम एवं सुश्री सोनम सिहाग ने किया एवं धन्यवाद प्रस्ताव डॉ. मुकेश कुमार मेघवंशी, वैज्ञानिक ‘एफ’ एवं प्रमुख, तकनीकी प्रबंधन ने दिया। इस अवसर पर डी.आर.डी.ओ. मुख्यालय से पधारे डॉ. विपुल कुमार गुप्ता, निदेशक प्रशासन (जैवविज्ञान निदेशालय), अरुण चौधरी, निदेशक, डी.आई.आई.टी.एम., डी.आर.डी.ओ. मुख्यालय के अलावा बड़ी संख्या में भारतीय उद्योग और शिक्षा जगत के प्रतिनिधि मौजूद थे।
उद्घाटन सत्र के बाद दो तकनीकी सत्रों का आयोजन भी किया गया जिसमें भविष्य की कार्ययोजना और संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की गयी। प्रथम तकनीकी सत्र में अन्य प्रस्तुतियों के अलावा डी.आर.डी.ई. द्वारा विकसित की गयी एन.बी.सी. एवं डेपा संबंधी कुल 09 प्रौद्योगिकियों का ए.एच.एस.पी. हस्तांतरण डॉ. यू. के. सिंह, महानिदेशक (जैवविज्ञान) डी.आर.डी.ओ. मुख्यालय एवं श्री आर.ए.गोवर्धन, अतिरिक्त महानिदेशक, गुणवत्ता नियंत्रण (डी.जी.क्यू.ए.) की उपस्थिति में सी.क्यू.ए. पुणे एवं सी.क्यू.ए. कानपुर को किया गया।
इसके अलावा डी.आर.डी.ई. ग्वालियर द्वारा विकसित की गयी 05 प्रौद्योगिकियों का हस्तांतरण निजी उद्यमों को किया गया। साथ ही साथ ऐसे निजी उद्योगों को ‘प्रौद्योगिकी एब्सॉर्पशन प्रमाणपत्र’ प्रदान किए गए, जिन्होंने डी.आर.डी.ई. ग्वालियर द्वारा विकसित की गयी प्रौद्योगिकियों को सफलतापूर्वक अंगीकृत किया है।

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