अमेरिका ने अपनी ही नौसेना को दिया बिना आंख वाला एफ35 फायटर जेट
नई दिल्ली. अमेरिका की सबसे एडवांस स्टेल्थ फायटर जेट F35 की कहानी अब एक बड़े घोटाले और देरी की मिसाल बन गयी है। पेंटागन ने हाल ही में मरीन कॉर्प्स को 6 F35 फाइटर जेट बिना रडार के डिलीवरी कर दिये है। नया एएन/एपीजी -85 रडार सिस्टम अप्रैल 2028 तक प्रॉडक्शन शुरू नहीं होगा।
F35 ज्वॉइंट प्रोग्राम ऑफिस के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल ग्रेगरी मासिएलो ने सीनेट की सुनवाई में साफ कहा है कि बिना रडार वाले यह जेट्स पूरी तरह मिशन कैपेबल नहीं माने जा सकते। यह बात इतनी सच्ची है कि इसे कोई छिपा नहीं सकता। दुनिया का सबसे महंगा फायटर प्रोग्राम है। जो अभी तक 400 बिलियन डॉलर से अधिक खर्च कर चुका है। अब तिबना आंखों वाले विमानों को डिलीवर कर रहा है।
अगर भारत F35 खरीदता तो क्या होता
एक ओर यह इंडियन एयरफोर्स को स्टेल्थ टेक्नोलॉजी, बेहतर सेंसर और नेटवर्क सेंट्रिक वॉरफेयर देता। पाकिस्तान और चीन के एयर डिफेंस को चीरने में मदद करता है। लेकिन दूसरी तरफ बिना रडार वाले जेट्स की डिलीवरी, देरी और भारी खर्च भारत के बजट पर बोझ बन सकता था। भारत एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट AMCA जैसे अपने प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। F35 जैसी विदेशी टेक्नोलॉजी खरीदने से पहले इन समस्याओं को समझना आवश्यक है।
F35 प्रोग्राम की समस्यायें अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री की कमजोरियों का खुलासा करती है। सच्चाई चेन, प्रॉडक्शन डिले और कॉस्ट कंट्रोल में परेशानी है। ट्रम्प इन मुद्दों पर ध्यान दे रहे हैं। लेकिन समाधान आसान नहीं है। भारत के लिये सबक है कि कोई भी हथियार परफेक्ट नहीं होता है। रडार सॉफ्टवेयर, इंजन और रखरखाव सब पर निर्भर रहना पड़ता है। F35 2028 तक नया रडार मिलने के बाद बेहतर हो सकता है। लेकिन फिलहाल यह प्रोग्राम चुनौतियों से भरा है। भारत को ट्रंप के ऑफर पर फिर से सोचना चाहिये। लेकिन अपनी शर्तो पर , संयुक्त उत्पादन, टेक्नोलॉजी शेयरिंग और लागत प्रभावी डील आवश्यक है।
यह मामला सिर्फ एक जेट का नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध और रक्षा खरीद की जटिलताओं का है। भारत जैसे देश को मजबूत एयरफोर्स चाहिये। लेकिन बिना आंखों वाला विमान नहीं है। ट्रंप की यात्रा और ऑफर ने नये द्वार खोले। लेकिन फैसला सावधानी से लेना होगा। एफ35 की कहानी जारी है। महंगा, शक्तिशाली लेकिन अभी सहीं नहीं है।

