सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे पर हाईकोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
ग्वालियर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने सरकारी जमीन पर कथित अवैध कब्जे जुंड़े फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने जनहित याचिका लगाने वाले चन्द्रेश त्यागी का नाम याचिका से हटा दिया गया है। हाईकोर्ट ने माना है कि स्वयं को सामाजिक कार्यकर्त्ता बताने वाले याचिकाकर्ता ने पर्यावरण संरक्षण का लेकर गंभीरता नहीं दिखाई है। हालांकि सरकारी जमीन पर कब्जे के आरोपों को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने मामले को बंन नहीं किया है। अब स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) के रूप में सुनने का फैसला लिया है।
8 बीघा जमीन पर अवैध कब्जा
याचिका में आरोप लगाया है कि पुरानी छावनी इलाके में लगभग 8 बीघा सरकारी जमीन पर अवैध बाउंड्रीवॉल बनाकर प्लॉट काटे जा रहे है। उन्हेें बेचा जा रहा है। मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को पर्यावरण संरक्षण के तहत पौध लगाने और उनकी देखभाल करने का निर्देश दिया था।
पौधे तो लगाये, देखभाल नहीं
जांच में सामने आया है कि याचिकाकर्ता ने औपचारिकता पूरी करते हुए पौधे तो लगाये, लेकिन उनकी देखभाल नहीं की है। इसके चलते सभी पौधे नष्ट हो गये। हाईकोर्ट ने इसे गंभीर लापरवाही माना है। हाईकोर्ट ने नगरनिगम से नये पौधे लगाने और 5 साल तक उनकी देखभाल का खर्च मांगा था। निगम ने इसकी लागत 1 लाख 53 हजार 765 रूपये बताई है। जब हाईकोर्ट ने यह राशि जमा कराने के लिये कहा तो याचिकाकर्ता की तरफ से इंकार कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा है कि याचिकाकर्ता का स्वयं का सामाजिक कार्यकर्ता बताना सही साबित नहीं हुआ है। अगर वह वास्तव में समाज और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार होते तो पौधों की देखभाल और खर्च वहन करने से पीछे नहीं हटते।
हाईकोर्ट का आदेश
याचिकाकर्ता चंद्रेश त्यागी का नाम हटाकर मामले को स्वत: संज्ञान जनहित याचिका में बदला गया।
वरिष्ठ अधिवक्ता एफ.ए. शाह को न्याय मित्र नियुक्त किया गया।
मामले की पूरी प्रोसेस फीस याचिकाकर्ता को जमा करनी होगी, नहीं करने पर जुर्माना लगाया जाएगा।
जिला प्रशासन और राजस्व विभाग को विवादित जमीन का सीमांकन कर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए गए।

