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ग्वालियर में हुआ ‘चित्रकूट‘ नाटक का मंचन

ग्वालियर भारतीय भक्ति काव्य परम्परा प्रथम सर्ग के रूपवाणी रंग समूह बनारस द्वारा प्रस्तुत ‘चित्रकूट‘ नाटक का कलाकारों द्वारा मनमोहन मंचन किया गया। संस्थान के सिथौली परिसर स्थित नाद एम्फीथिएटर में गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के विशिष्ट प्रसंगों पर एकाग्र नाटक के निर्देशक व्योमेश शुक्ल कलाकारों की टीम के साथ उपस्थित रहे।
इस अवसर पर फाउंडर चांसलर रमाशंकर सिंह, चांसलर रुचि सिंह, प्रो-चांसलर डॉ. दौलत सिंह चौहान, वाइस चांसलर प्रोफेसर योगेश उपाध्याय सहित विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, डीन, प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर, छात्र-छात्राएं और बड़ी संख्या में ग्वालियर शहर कला रसिक व गणमान्य नागरिक और युवाजन उपस्थित रहे।
जब राम ने अपने बाण से कौए की एक आंख नष्ट कर दी
नाद एम्फीथिएटर के ‘चित्रकूट‘ नाटक मंचन का शुभारंभ अतिथि दीपेंद्र सिंह कुशवाह, नवल शुक्ला, डॉ. आलोक शर्मा, संजय कुलश्रेष्ठ, अशोक श्रोत्रिय द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया। नाटक का प्रारंभ गणेश वंदना से हुआ। नाट्य मंचन के दौरान चित्रकूट में राम-सीता-लक्ष्मण का वनवास निवास होता है। जहां इंद्रपुत्र जयंत कौए का रूप धारण कर सीता से अभद्रता करता है। इसको लेकर राम क्रोधित हो जाते हैं और कौए को सबक सिखाने के लिए जाते हैं। इस दौरान नाम अपने बाण से उस कौए की एक आंख को नष्ट कर देते हें। इस प्रसंग में जयंत जो कौए का रूप धारण करता है की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही। यह प्रसंग अहंकार और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक बनकर दर्शकों के मन को छू
जटायु ने किया रावण के साथ युद्ध
चित्रकूट नाटक मंचन के दौरान सीता हरण के प्रसंगों का कलाकारों द्वारा सजीव मंचन किया गया। रावण स्वर्ण मृग का रूप धारण कर वन में जाता है। सीता स्वर्ण मृग को पानी की इच्छा राम के समक्ष प्रकट करती हैं। राम जब उस स्वर्ण मृग को ढूंढने जाते हैं तो काफी समय बात वह नहीं लौटते, इस दौरान लक्ष्मण कुटिया के पास अपनी रेखा खींच कर चले जाते हैं। ऐसे में रावण साधु का भेष धरकर सीता से भीक्षा मांगता है। जैसे ही सीता लक्षमण रेखा को पार करती हैं तो रावण सीता का हरण कर अपने साथ ले जाता है। इस दौरान जटायु प्रसंग होता है। सीता को बचाने के लिए जटायु रावण से युद्ध करता है और अंततः वह घायल होकर भूमि पर गिर पड़ता है। राम द्वारा जटायु का अंतिम संस्कार का दृश्य दर्शकों की आंखें नम कर गया। इस दृश्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति की उस मूल भाव को अभिव्यक्त किया गया, जहां मनुष्य और मनुष्येत्तर के बीच कोई भेद नहीं किया जाता। चित्रकूट नाटक मंचन के दौरान लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, लक्ष्मण पर शक्ति का आघात, राम-रावण युद्ध जैसे प्रसंगों का रोमांचक मंचन हुआ। प्रकाश और ध्वनि तकनीक के प्रभावशाली प्रयोग ने इन दृश्यों को जीवंत बना दिया। अंत में भरत मिलाप के भावपूर्ण दृश्य के साथ नाटक का समापन हुआ, जिसने नाद एम्फीथियेटर में उपस्थित सभी दर्शकों को गहराई से भावविभोर कर दिया।

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