कुलपति प्रो पंडित साहित्य कुमार नाहर ने सितार वादन, पण्डित राजन-साजन मिश्र ने ए री आनंद भयो री गायन पेश किया
ग्वालियर तानसेन समारोह में मंगलवार को सजी सांध्यकालीन सभा में स्वर साज़ का उदात्त रूप सुनने को मिला। प्रख्यात सितार वादक एवं राजा मानसिंह संगीत एवं कला विश्वविद्यालय ग्वालियर के कुलपति प्रो पंडित साहित्य कुमार नाहर ने जहाँ अपने सितार वादन से जहां रसिकों को आनंदलोक की सैर कराई वहीं बनारस घराने के विश्व विख्यात ख़याल गायक पंडित राजन मिश्र एवं पंडित साजन मिश्र ने अपनी अनूठी गायकी से सभा को उत्कृष्टता के चरम पर पहुंचाया। इन सबके बीच विश्व संगीत एवं हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के अन्य साधकों ने भी संगीत के नए नए रंग बिखेरे।
तानसेन समारोह की सातवी एवं मंगलवार की सांध्यकालीन सभा की शुरूआत राजा मानसिंह तोमर कला एवं संगीत विश्व विद्यालय द्वारा प्रस्तुत ध्रुपद गायन के साथ हुई। राग ” भीम पलाशी” और चौताल में निबद्ध बंदिश के बोल थे “ए री आनंद भयो री”। ध्रुपद गायन में पखावज पर जयवंत गायकवाड़, हारमोनियम पर विवेक जैन एवं सारंगी पर उस्ताद अब्दुल हमीद खां ने संगत की।
शिशिर ऋतु में बसंत के रंग भर गई बनारस घराने की गायकी
बनारस घराने के सुविख्यात गायक पद्मभूषण पण्डित राजन-साजन मिश्र ने अपनी गायकी से शिशिर ऋतु की सर्द हवाओं में बसंत के रंग भर दिए। दोनों बन्धुओं ने राग ” सोहनी” में जब अपनी सुरीली आवाज में बंदिश “आई ऋतु नवेली बसंत” का गायन किया तो एक बारगी लगा समय से पहले ही बसंत ने अपनी दस्तक दे दी है।
तानसेन समारोह की सबसे सर्द संध्या के आखिर में मिश्र बंधुओं की प्रस्तुति हुई। उच्चकोटि के गायन के सम्मोहन में बंधे रसिक कड़ाके की सर्दी के बावजूद अपनी जगह से हिले भी नहीं। मिश्र बंधुओं ने प्रभावशाली और सधा हुआ गायन पेश कर बता दिया कि क्यों वे श्रेष्ठ पंक्ति के गायक हैं। उन्होंने अपने गायन से रसिकों को सर्दी का जरा भी अहसास नहीं होने दिया।पण्डित राजन-साजन मिश्र ने संगीत को पूजा एवं आराधना बताते हुए राग ” पूरिया” से अपने गायन की शुरुआत की। बेहद सधे हुए आलाप के बाद विलंबित एक ताल में बंदिश पेश की। जिसके बोल थे ” पिया गुणवंत..”। इसके बाद तीन ताल की बंदिश ” मैं तो करि आई पिया संग रंग रलियां” अपनी खनकदार मधुर आवाज में गाई तो प्रेम-श्रंगार के सागर हिलोरें लेने लगे। इसी कड़ी में उन्होंने द्रुत एक ताल में “पिया संग लागी लगन” बंदिश गाकर रसिकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। दोनों भाइयों का तालमेल तो अद्भुत था ही, साथ ही बनारस घराने की विशेषता यानी ठहराव और शब्दों की शुद्धता ने संगीत पारखी रसिकों को गहरे तक प्रभावित किया। तबले पर उस्ताद अकरम खां और हारमोनियम पर पण्डित सुमित मिश्रा ने मनमोहन संगत की।
बर्फीली हवाओं को मिली वेस्टर्न म्यूजिक की तपन
हिमालय की ओर से आ रही बर्फीली हवाओं से हुए सर्द मौसम में वेस्टर्न म्यूजिक ने तपन पैदा कर दी। तानसेन समारोह में मंगलवार की सांध्यकालीन सभा में ब्रिटेन के ख्यातिनाम पियानो वादक स्टीफन काय ने तेज रिदम में बेहतरीन धुनें निकालकर कड़कड़ाती ठंड में जेबों में हाथ डाले बैठे रसिकों को तालियाँ बजाने के लिए मजबूर कर दिया। उनके वादन में पश्चिमी धुनों के साथ भारतीय रागों की छाया भी साफ झलक रही थी। उन्होंने बेस्टर्न क्लासिकल म्यूजिक की ओजपूर्ण धुनें बजाईं। स्टीफन को सर्वश्रेष्ठ भारतीय कीबोर्ड प्लेयर श्रेणी में जैक डेनियल रॉक पुरस्कार मिल चुका है। सन 1920 के दशक में बनीं मूक फिल्मों को अपने संगीत से आवाज देने का काम भी स्टीफन कर रहे हैं।
तीन घरानों की गायकी सुनकर रसिक झूमे
तानसेन समारोह में पुणे से प्रस्तुति देने आईं सुश्री साधना देशमुख मोहिते ने अपनी गायन में ग्वालियर, आगरा व जयपुर घरानों की गायकी का एहसास कराया। उन्होंने सायंकालीन राग ” पूरिया धनाश्री” में सुमधुर गायन किया। साधना देशमुख ने इस राग और एक ताल में बड़ा ख्याल ” तन मन वारूँ” एवं तीन ताल में छोटा ख्याल (पंजाबी बंदिश) “आना वे दिल माना वे” पेश किया। उनके गायन में सिलसिलेवार बढ़त व बंदिश के शब्दों का स्पष्ट उच्चारण के साथ साथ तीनों घराने की विशेषताएँ साफ झलक रहीं थीं। उन्होंने एक खमाज टप्पा सुनाकर अपने गायन को विराम दिया।साधना देशमुख के गायन में तबले पर मनोज पाटीदार व हारमोनियम पर विवेक जैन ने संगत की।
सितार वादन के सम्मोहन में बंधे रसिक…
तानसेन समारोह की सातवीं सभा के तीसरे कलाकार के रूप में मंच पर आये प्रख्यात सितार वादक प्रो पंडित साहित्य कुमार नाहर ने अपने सितार वादन से रसिकों को सिक्त कर दिया। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय में बतौर कुलपति पदस्थ प्रो नाहर देश के कई संगीत समारोहों में शिरकत कर चुके हैं। अपनी पदस्थापना के ठीक सौंवे दिन उनकी प्रस्तुति भी एक संयोग ही है। बहरहाल, उन्होंने अपने वादन की प्रस्तुति राग वाचस्पति से की। राग वाचस्पति कर्नाटक शैली का राग है। इस राग को बजाने में प्रो नाहर ने कई रंग भरे। आलाप और जोड़ आलाप से शुरू करके आपने इस राग में 2 गतें बजाईं। दोनों ही गतों को बजाने में आपने अपने कौशल का बखूबी परिचय दिया। रागदारी की बारीकियों के साथ आपने विविध लयकरियाँ बजाने में जो कमाल दिखाया वह काबिले तारीफ कहा जाएगा। द्रुत गत बजाने में भी आपने खूब रंग भरे। आपका वादन गायकी और तंत्रकारी अंग के संतुलन को लेकर चलता है। आपने अपने वादन का समापन मिश्र खमाज में एक पारंपरिक धुन से किया। आपके साथ तबले पर बनारस घराने के युवा तबला वादक अभिषेक मिश्र ने मनोहारी संगत का प्रदर्शन किया।

