शहर के विकास के निर्माण कार्य की चाल सुस्त-स्वर्णरेखा पर बन रही एलिवेटेड रोड निर्माण धीमी चाल, विवेकानंद नीडम आरओबी भी हुआ लेट, मुरार नदी बनी नाला, साडा नहीं हो पाई बसाहट

ग्वालियर. विधानसभा चुनाव 2018 में शहर की 3 समेत ग्वालियर ग्रामीण विधानसभा में आमजन के वोट हासिल करने के लिये नेताओं ने मुरार और स्वर्णरेखा नदी को बेहतर करने के लिये साडा में बसाहट करने समेत अन्य वादे किये थे । इन वादों में से जनता के इस्तेमाल में आने वाले काम अभी भी अधूरे है। इस बार फिर से विकास कार्यो को लेकर पहुंच रहे नेताओं की बात सुनने के बाद लोग जनोपयोगी कामों का हिसाब मांगने लगे हैं। जनता को सुविधा देने के लिये कराये जा रहे करोड़ों रूपाये के कामों का हिसाब दे रहे हैं जिला स्तरीय नेताओं के सामने अब जनता के सवाल के रूप में परेशानी बन रहे हैं। दरअसल, रियासतकाल में मुरार की 90 प्रतिशत जलापूर्ति का साधन रही मुरार नदी जमीन के लालच में सिकुडकर नाला बन गयी है। लश्कर और ग्वालियर के जलस्तर को बेहतद रखने वाली स्वर्णरेखा नदी अतिक्रमण का शिकार बन कर सीमेंट से पाट दी गयी है। नाका चन्द्रवदनी से सिरोल को जोड़ने वाला रेलवे ओवर ब्रिज न बनने से हर दिन लगभग 10 हजार लोगों को 4 किमी का चक्र लगाना पड़ रहा है। इन कामों के अलावा शहर के विकास को पहचान देने वाला टैक्सटाइल इंक्यूबेशन बनने के बाद भी युवाओं को आकर्षित नहीं कर सका है। इसी तरह शहर के पास नया शहर बनाने का सपना दिखाकर साडा क्षेत्र600 करोड़ रूपये के काम हुए है। 684 आवास बनाये गये लेकिन एक भी घर आबाद नहीं हुआ।
न्मामि गंगे अभियान में शामिल मुरार नदी रमौआ बांध से निकलकर शहर की सीमा में 12.5 किमी बहती है। रियासतकाल मे लगभग 100 मीटर के पाट वाली यह नदी अब नाला बन गयी है। न्यू सिटीसेंटर से लेकर कालपी ब्रिज तक नदी पर सबसे अधिक अतिक्रमण है।नदी पार टाल पुल के दोनों और नदी की चौड़ाई बमुश्किल 20 फीट बची है। मुरार नदी को बेहतर करने के लिये प्रोजेक्ट बना लेकिन क्षेत्रीय नेताओं की असहमति के बाद यह काम बंद हो गया। अब इसके दोनों और सड़कें बनाकर नदी की सीमा को बांधने की तैयार है। जमन के लालच में में किया जा रहा यह काम भविष्य में बाढ़ जैसी स्थिति बनने पर सबसे बड़ी परेशानी बन सकता है।
एलिवेटेड रोड़ के लिये बने पिलर
स्वर्ण रेखा नदी पर पहले चरण में ट्रिपल आईटीएम से फूलबाग तक 6.5 किमी और दूसरे चरण में फूलबाग से हनुमान बांध तक करीब 9 किमी सड़क बनना है। इसके लिये 1321.56 करोड़ रूपये की स्वीकृति हो चुकी है। जबकि नदी को साफ रखने के लिये अभी तक कोई ठोस प्लानिंग नहीं हुई है। नदी के उद्गम स्थल सहित बहाव क्षेत्र में हुए अतिक्रमण भी नहीं हटाये गये है। इसको लेकर हाई कोर्ट भी कई बार फटकार लगा चुका है।

ग्वालियर के 4 आरओबी के साथ ही विवेकानंद नीडम रेलवे ओवरब्रिज का काम शुरू हुआ था। 3 बार जिाइन बदलने के साथ ही यह प्रोजेक्ट 3वर्ष लेट हो चुका है। वर्तमान में र्गार लॉचिंग की तकनीकी कमियों की वजह से काम उलझा है। पुल के काम की वजह से रेलवे फाटक से आवागमन बंद कर दिया है। लोगों को 4 किमी का चक्कर लगाकर जाना पड़ता है।
यह निर्माण कार्य पूरे नहीं हो पाये
800 करो़ रूपये की लागत का 309 किमी लम्बा अटल प्रगतिपथ अभी तक शुरू नहीं हुआ है। यह सड़क बनने पर लोगों का जुडाव मुंबई-दिल्ली एक्सप्रेस वे इटावा-बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे से जुड़ सकेगा।
2500 करोड़ रूपये की लागत से आगरा-ग्वालियर हाइवे 6 लेन होना है। यह अभी चार लेन का हैं।
अमृत 2.0 के अंतर्गत 380 करोड़ रूपये की लागत से चम्बल एवं आसन नदी से ग्वालियर तक पानी लाने की व्यवस्था पर अभी तक काम शुरू नहीं हुआ।
730 करोड़ रूपये की लागत से बनने वाले 28 किमी लम्बे वेस्टर्न वायपास को लेकर अभी तक काम शुरू नहीं हुआ है। यह सड़क बनने पर साड़ा में बसाहट के लिये लोग आकर्षित हो सकते हैं।
33 करोड़ रूपये की लागत से कचरा प्रबंधन के लिये आधुनिक तकनीकी युकत व्यवस्था के दावे किये गये। इसके बावजूद शहर में कचरा प्रबंधन अभी तक सही नहीं हुआ है।

