बिना मुखिया के चल रहा जल संसाधन विभाग, बांधों की निगरानी और बाढ़ प्रबंधन पर उठे सवाल

ग्वालियर -मानसून की सक्रियता के बीच ग्वालियर संभाग में जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। संभाग के प्रमुख बांधों की निगरानी करने वाला विभाग पिछले एक माह से कार्यपालन यंत्री (Executive Engineer) के बिना संचालित हो रहा है। ऐसे समय में जब बारिश का दौर तेज हो रहा है और किसी भी समय बाढ़ जैसे हालात बन सकते हैं, विभाग में नेतृत्व का अभाव प्रशासनिक चिंता का विषय बन गया है।
ग्वालियर संभाग के प्रमुख तिघरा, हरसी और केकटो (ककेटो) बांध की सुरक्षा, जलस्तर की निगरानी, नहरों के रखरखाव और बाढ़ नियंत्रण की जिम्मेदारी जिस कार्यपालन यंत्री पर होती है, वह पद करीब एक माह से रिक्त पड़ा है। इसके चलते विभाग की नियमित मॉनीटरिंग और रखरखाव प्रभावित हो रहा है।


संभागायुक्त ने ली थी बाढ़ तैयारियों की बैठक
हाल ही में संभागायुक्त मनोज खत्री ने बाढ़ और अतिवृष्टि से निपटने की तैयारियों को लेकर सभी संबंधित विभागों की बैठक ली थी। बैठक में जल संसाधन विभाग को बांधों के जलस्तर की सतत निगरानी, समय पर पानी छोड़ने की सूचना देने, निचले क्षेत्रों को अलर्ट करने तथा राहत एवं बचाव एजेंसियों के साथ समन्वय बनाए रखने के निर्देश दिए गए थे हालांकि विभाग में वरिष्ठ अधिकारी की अनुपस्थिति के कारण इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।


बांधों की निगरानी और नहरों का रखरखाव प्रभावित
सूत्रों के अनुसार ग्वालियर संभाग के कई बांधों की नहरों में जगह-जगह क्षति पहुंची है। समय पर मरम्मत और नियमित मेंटेनेंस नहीं होने से सिंचाई व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। कई स्थानों पर नहरों के किनारे कटाव और रिसाव की शिकायतें भी सामने आई हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी नहीं होने से निर्णय प्रक्रिया धीमी पड़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के दौरान बांधों की सुरक्षा केवल जलस्तर तक सीमित नहीं होती, बल्कि स्पिलवे, गेट, नहरों और तटबंधों की लगातार निगरानी भी उतनी ही आवश्यक होती है।
बाढ़ राहत कार्यों पर कौन करेगा समन्वय?
यदि लगातार बारिश के कारण तिघरा, हरसी अथवा अन्य बांधों से पानी छोड़ने की नौबत आती है, तो सबसे बड़ी चुनौती राहत एवं बचाव कार्यों के समन्वय की होगी। सामान्य स्थिति में कार्यपालन यंत्री जिला प्रशासन, आपदा प्रबंधन, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के साथ समन्वय स्थापित कर स्थिति की मॉनीटरिंग करता है।
वर्तमान में यह जिम्मेदारी किस अधिकारी के पास है, इसे लेकर विभागीय स्तर पर स्पष्टता नहीं है। ऐसे में आपातकालीन स्थिति में निर्णय लेने में देरी होने की आशंका बनी हुई है।
कई कार्यालयों में अधिकारियों की कमी
जल संसाधन विभाग के विभिन्न कार्यालयों में भी अधिकारियों के पद लंबे समय से रिक्त बताए जा रहे हैं। इसका सीधा असर तकनीकी निरीक्षण, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता, मरम्मत और परियोजनाओं की निगरानी पर पड़ रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि सीमित संसाधनों और अधिकारियों की कमी के कारण नियमित निरीक्षण प्रभावित हो रहे हैं।
विशेषज्ञों की राय
जल प्रबंधन विशेषज्ञों के अनुसार मानसून के दौरान प्रत्येक बड़े बांध की 24×7 मॉनीटरिंग, जलस्तर का वैज्ञानिक विश्लेषण, गेट संचालन की पूर्व योजना तथा निचले क्षेत्रों को समय पर चेतावनी देना अत्यंत आवश्यक है। यदि विभाग में नेतृत्व का अभाव बना रहता है तो आपात स्थिति में जोखिम बढ़ सकता है।
प्रमुख सवाल
एक माह से कार्यपालन यंत्री का पद खाली होने के बावजूद अब तक नियुक्ति क्यों नहीं हुई?
तिघरा, हरसी और केकटो बांधों की वर्तमान निगरानी कौन कर रहा है?
क्षतिग्रस्त नहरों के रखरखाव और मरम्मत की जिम्मेदारी किस अधिकारी के पास है?
बाढ़ की स्थिति बनने पर राहत एवं बचाव कार्यों का समन्वय कौन करेगा?
मानसून के बीच रिक्त पदों को भरने के लिए विभाग ने क्या कदम उठाए हैं?
जल संसाधन विभाग में नेतृत्व की कमी ऐसे समय सामने आई है, जब मानसून अपने चरम की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में बांधों की सुरक्षा, नहरों का रखरखाव और संभावित बाढ़ प्रबंधन को लेकर प्रशासन को शीघ्र निर्णय लेने की आवश्यकता है, ताकि किसी भी आपात स्थिति में जन-धन की हानि से बचा जा सके।

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