MP हाईकोर्ट ने धार भोजशाला को माना वाग्देवी का मंदिर, अयोध्या केस को फैसले का माना आधार, मुस्लिमों नहीं होगी नमाज का इजाजत


इंदौर. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार स्थित भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। शुक्रवार को दिये गये फैसले में हाईकोर्ट ने कहा है कि हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार किया है। एएसआई एक्ट के प्रावधानों के साथ अयोध्या मामले को भी आधार माना है। न्यूज वेबसाइट बार एंड बेंच के अनुसार हाईकोर्ट ने कहा है कि एंतिहासिक और संरक्षित जगह देवी सरस्वती का मंदिर है। केन्द्र सरकार औरा एएसआई यह फैसला लें कि भोजशाला का मैनेजमेंट कैसा रहेगा। 1958 एक्ट के तहत इस प्रॉपर्टी पूरा मैनेजमेंट एएसआई के हाथ में ही रहेगा।
हाईकोर्ट ने ASI का 2003 का वह आदेश भी रद्द कर दिया है। जिसमें एएसआई ने भोजशाला में हिन्दुओं को पूजा का अधिकारी नहीं दिया था। उस आदेश को भी खारिज कर दिया है जिसमें मुस्लिमों को नमाज पढ़ने का अधिकार दिया गया था।
कोर्ट ने क्या कहा?
फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि भोजशाला का मूल स्वरूप संस्कृत शिक्षा केंद्र का था। अदालत ने ASI सर्वे और वैज्ञानिक अध्ययन पर भरोसा जताते हुए कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और कोर्ट वैज्ञानिक निष्कर्षों पर भरोसा कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाली संरचनाओं का संरक्षण करे।

हाईकोर्ट की सुनवाई किसने किया तर्क दिये
हिन्दू पक्ष
भोजशाला पर प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट लागू नहीं होता है। यह एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक है। प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम 1951 की सूची में भोजशाला का नाम दर्ज है। वर्ष 2024 में अश्विनी उपाध्याय केस में दिये गये तर्क को भोजशाला मामले में लागू नहीं किया जा सकता है। 17 अप्रैल 2003 को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा जारी आदेश को निरस्त करने की मांग, हाईकोर्ट से आग्र्रह किया कि भोजशाला का धार्मिक स्वरूप तय कर इसे पूर्णरूप से हिन्दू समाज को सौंपा जाये। इससे मां सरस्वती की पूजा और हवन सालभर निर्बाध रूप से किया जा सके।
मुस्लिम पक्ष
वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने हाईकोर्ट में कहा है कि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि भोजशाला मंदिर है। मस्जिद है या जैनशाला। विवादित स्थल का धार्मिक स्वरूप तय करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है। हाईकोई अनुच्छेद 226 के तहत रिट अधिकार क्षेत्र में सुनवाई कर रहा है। वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद ने एएसआई सर्वे पर सवाल उठाते हुए कहा था कि उपलब्ध कराई गयी वीडियोग्राफी स्पष्ट नहीं है। रंगीन तस्वीरें भी नहीं दी गयी है। उन्होंने अयोध्या फैसले का उल्लेख करते हुए कहा है कि वहां रामलला विराजमान की मूर्ति मौजूद थी। भोजशाला में कोई मूर्ति स्थापित नहीं है।
जैन समाज
जो प्रतिमा मां वाग्देवी की बताई जा रही है, वह जैन समुदाय की आराध्य मां अंबिका की है। सीहोर में मां अंबिका के मंदिर में ठी वैसी ही प्रतिमा है। जो भोजशाला में मिली थी। इसे जैन तीर्थ घोषित किया जाना चाहिये।

