पदोन्नति में आरक्षण-एससी-एसटी के समृद्ध लोगों के परिजनों को पिछड़ा मानना कितना उचित है-सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि उच्च पदों पर बैठे एससी-एसटी समुदाय के समृद्ध लोगों को परिजनों को सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण का कोटो देने की दलीलों पर गुरूवार को सवाल उठाये। 5 जजों की संविधान पीठ ने पूछा कि ‘‘आरक्षण की बदौलत मि. एक्स किसी राज्य के मुख्य सचिव बनाये गये। अब क्या उनके परिजनों को इतना पिछड़ा मानना उचित होगा कि उन्हें पदोन्नति में आरक्षण का कोटो दें। ताकि उन्हें त्वरित वरिष्ठता मिल जाये।’’ चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि ऐसे लोगों को पदोन्नति में आरक्षण कोटो से इंकार करने के लिये क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू क्यों नहीं हो सकता है। इस मुद्दे पर गुरूवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चली है। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल के नेतृत्व में एएसजी तुषार मेहता, सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह, श्याम दीवान, दिनेश द्विवेदी और पीएस पटवालिया ने में पदोन्नति में आरक्षण का समर्थन किया। इन्होंने मांग की कि 2006 का एम नागराज फैसला पुर्नविचार के लिये बड़ी बेंच को भेजा जाये। यह फैसला कहता है कि पदोन्नति में आरक्षण देने से पहले पिछड़ेपन, नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व और पूरी प्रशासनिक दक्षता का मात्रात्मक डाटा देने के लिये राज्य बाध्य है। दलील है कि इस फैसले के चलते पदोन्नति में आरक्षण में एससी एसटी का आरक्षण बन्द हो गया, दूसरी तरफ, सीनियर एडवोकेट शांतिभूषण और राजीव धवन ने पदोन्नति में आरक्षण का विरोध किया, दलीलें 29 अगस्त को भी जारी रहेंगी।
राजनीतिक दल एससी एसटी वर्गो को वोटबैंक समझते है-शांतिभूषण
सीनियर एडवोकेट शांतिभूषण ने कहा कि जब आप क्लास 1 अधिकारी बन जाते हैं तो आप पिछड़े वर्ग में नहीं रहते, राजनीतिक दलों तो एससी एसटी वर्गो को वोट बैंक समझते हैं, यह समानता और नौकरियों में बराबर के अधिकारों का उल्लघंन हैं।
क्वालीफाइंग मार्क्स में छूट दे सकती है सरकार-संविधान पीठ
संविधान के अनुच्छेद 335 का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि ‘‘सरकार एससी एसटी उम्मीदवारों को क्वालीफाइंग मार्क्स में छूट दे सकती है लेकिन मुद्दा यह है कि क्या नौकरी में आने के बाद भी किसी व्यक्ति को पदोन्नति में आरक्षण दिया जा सकता है।
100 प्रतिशत सफाई कर्मी इसी वर्ग से, यही पिछड़ापन दिखाता हैं
मप्र सरकारी की ओर से सीनियर एडवोकेट निधेष गुप्ता ने कहा कि नागराज फैसले ने राज्य की राय संबंधी फैसले में बने कानून को निरस्त कर दिया था। इससे राज्य की नौकरियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व को लेकर चिंतायें पैदा होती है मण्डल केस का हवाला देकर उन्होंने कहा कि राज्यों को आरक्षण का अधिकार देने वाले अनुच्छेद 16(4) में स्पष्ट है कि राज्य सरकार की नौकरियों में पिछड़े वर्ग के पर्याप्त प्रतिनिधित्व का मुद्दा राज्य की संतुष्टि का विषय है, इस पर संविधान बेंच ने कहा कि अगर नौकरियों में समुदाय का प्रतिनिधित्व होता है तो कोर्ट एससी -एसटी को पदोन्नति में आरक्षण देने के विचार पर सवाल करेगा । श्री गुप्ता ने एससी एसटी समुदाय के सामाजिक पिछड़ेपन का पहलु उठाया । उन्होंने कहा कि सफाई कर्मी 100 प्रतिशत इसी समुदाये से आते हैं, यह दिखाता है कि समुदाय 100 प्रतिशत पिछड़ा हुआ है। सीनियर एडवोकेट दिनेश द्विवेदी ने कहा कि मात्रात्मक आंकड़ों के बजाय यही आधार इनका पिछ़डापन साबित करता है कि इन्हें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के तौर पर नोटिफाई किया गया है।

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